मूड स्टेबलाईजर / उन्माद-अवसाद की दवाइयाँ 

प्र: मूड स्टेबलाईजर दवाएँ क्या होती है ?
>बाइपोलर डीजोरडर (द्विध्रुवी विकार) में व्यक्ति की मानसिक अवस्था (मूड) एक जैसी नहीं रहती. ये कभी बहुत खुशी तो कभी बहुत दू:खी के बीच बदलती रहती है. इन असंतुलित मानसिक अवस्थाओं को संतुलित करने के लिए जो दवाएँ उपयोग की जाती है वो मूड स्टेबलाईजर कहलाती है.

प्र: मेरा डॉक्टर इस रोग में जो दवा दे रहा है, वो एंटी-साईकोटिक है (मैंने इंटरनेट पर चेक किया है), क्या वो सही इलाज कर रहा है?
>वो ठीक है, लिथियम एक मात्र शुद्ध मूड स्टेबिलाईजर है. बाकी दवाईयां अन्य रोगों में भी उपयोग होती है.
मुख्य रूप से मूड स्टेबलाईजर के तीन ग्रुप है :
१. लिथियम 
२. एंटी-एपिलेप्तिक (मिर्गी की दवाएं)
३. एंटी-साइकोटिक (साइकोसिस की दवाएं)

प्र : अभी मैं बिलकुल ठीक हूँ. क्या मैं अपनी मूड-स्टेबलाईजर दवाएँ बंद कर सकता हूँ?
>जी नहीं, इन बीमारियों में ज्यादातर पूरी जिंदगी भर बार-बार होने का खतरा रहता है. इसकी तुलना मधुमेह (डाईबिटीज) से की जा सकती है. 
         जैसे डाईबिटीज में पूरी जिंदगी दवा खानी पड़ती है और जब तक हम दवा खाते हैं हमारा सुगर कंट्रोल में रहता है. उसी तरह जबतक हम मूड-स्टेबिलाईजर दवाएँ लेते हैं तबतक हमारा मूड कंट्रोल में रहता है. दवा बंद करने पर बीमारी फिर से होने का खतरा रहता है. 
 कुछ रोगियों में चिकित्सक की सलाह पर दवा बंद की जा सकती है. ये कई बातों पर निर्भर करती है जैसे ये बीमारी कितनी बार हुई है, इसके लक्षण कितने गंभीर थे.

प्र: इन दवाओं के साथ क्या मुझे कोई सावधानी भी वरतनी चाहिए?
>दूसरी दवाओं की तरह मूड-स्टेबलाईजर दवाओं की भी अन्य दवाओं के साथ प्रतिक्रिया हो सकती है. कोई भी दवा (खासकर दर्दनिवारक & एंटीबायोटिक) लेने से पहले अपने डॉक्टर को इन दवाईयों के बारे में अवश्य बताना चाहिए. लिथियम की विशेषताएँ अलग है इसीलिए इसके बारे में अलग से विस्तार से बताया गया है.